जहाँ बंजर धरती ने ओढ़ी हरियाली: किन्नौर के Forest Man A.D. Negi की प्रेरक कहानी

जहाँ बंजर धरती ने ओढ़ी हरियाली: किन्नौर के Forest Man A.D. Negi की प्रेरक कहानी

हिमाचल प्रदेश का किन्नौर जिला अपनी ऊँची पर्वत चोटियों, बर्फीली हवाओं और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन ऊपरी किन्नौर का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है, जिसे शीत मरुस्थल कहा जाता है। यहाँ वर्षा बहुत कम होती है, सर्दियाँ बेहद कठोर होती हैं और ऊँचाई के कारण पेड़-पौधों का उगना आसान नहीं होता। ऐसी कठिन परिस्थितियों में आनंद ध्वज नेगी, जिन्हें आम तौर पर ए.डी. नेगी के नाम से जाना जाता है, ने अपने संकल्प और मेहनत से बंजर भूमि को हरे-भरे जंगल में बदल दिया।

ए.डी. नेगी का जन्म किन्नौर के सुनम गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने पहाड़ों, जंगलों और खेती-किसानी को करीब से देखा। उन्हें यह महसूस होता था कि किन्नौर के पारंपरिक जंगल धीरे-धीरे कम हो रहे हैं और इससे मिट्टी, जलस्रोतों तथा स्थानीय जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यही चिंता आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य बन गई।

सरकारी नौकरी से पर्यावरण सेवा तक

ए.डी. नेगी हिमाचल प्रदेश सरकार के डेजर्ट डेवलपमेंट प्रोग्राम से जुड़े हुए थे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य शीत मरुस्थलीय क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण को रोकना और बंजर भूमि का विकास करना था। सरकारी योजनाओं के बावजूद कई स्थानों पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे थे। वर्ष 1998 में नेगी ने थांग करमा क्षेत्र में स्वयंसेवक के रूप में जंगल विकसित करने का निर्णय लिया।

थांग करमा, पूह से लगभग 50 किलोमीटर ऊपर स्थित एक दुर्गम क्षेत्र है। यह इलाका ऊँचा, ठंडा और पानी की कमी वाला था। सामान्य परिस्थितियों में भी यहाँ पौधों का जीवित रहना कठिन था, जबकि शीत मरुस्थल में खेती और वनीकरण उससे भी बड़ी चुनौती थी। लेकिन नेगी ने इस कठिनाई को असंभव नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देखा।

20 हजार से अधिक पौधों का सपना

ए.डी. नेगी ने सबसे पहले पौधशाला तैयार की। उन्होंने स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों को चुना और उन्हें छोटे स्तर पर विकसित करना शुरू किया। शुरुआत में उनकी नर्सरी के लगभग 80 प्रतिशत पौधे नष्ट हो जाते थे। तेज हवाएँ, कम तापमान, पानी की कमी और जंगली जानवर पौधों के लिए बड़ी समस्या थे।

फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने पौधों की देखभाल के तरीकों में लगातार सुधार किया। स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक तकनीकों को मिलाकर उन्होंने ऐसी पद्धति विकसित की, जिससे पौधों के जीवित रहने की दर धीरे-धीरे बढ़ने लगी। कई लेखों और रिपोर्टों में उनके द्वारा 20 हजार से अधिक पौधे लगाने का उल्लेख मिलता है, जबकि व्यापक क्षेत्र में उनके प्रयासों से लगभग 30 हजार पेड़ों का वन विकसित हुआ।

उनके लगाए गए पेड़ों में पॉपलर, विलो, जंगली खुबानी, रोबिनिया, जुनिपर और अन्य स्थानीय प्रजातियाँ शामिल थीं। इन पेड़ों ने धीरे-धीरे उस सूने भूभाग का स्वरूप बदल दिया। जहाँ पहले केवल पत्थर और सूखी मिट्टी दिखाई देती थी, वहाँ हरियाली, पक्षियों और छोटे जीव-जंतुओं के लिए नया आवास बनने लगा।

पानी बचाने की अनोखी तकनीक

शीत मरुस्थल में वनीकरण की सबसे बड़ी चुनौती पानी की उपलब्धता थी। नेगी ने ढलानों पर कंटूर प्लांटेशन तकनीक अपनाई। इसमें ढलान की प्राकृतिक ऊँचाई के अनुसार पौधों की कतारें बनाई जाती हैं, ताकि पानी तेजी से नीचे बह जाने के बजाय मिट्टी में ठहर सके।

उन्होंने छोटे-छोटे जल-चैनल और मेड़ें बनाईं। इनसे बर्फ पिघलने और बारिश से मिलने वाला पानी पौधों की जड़ों तक पहुँचता था। इस तकनीक से मिट्टी का कटाव भी कम हुआ और नमी लंबे समय तक बनी रही। उन्होंने जल-संरक्षण के साथ-साथ मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए क्लोवर जैसे पौधों का भी उपयोग किया। ये पौधे मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने और नमी बनाए रखने में सहायक होते हैं।

नेगी ने स्थानीय संसाधनों का भी समझदारी से इस्तेमाल किया। पौधों को ठंड से बचाने के लिए प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया गया और नर्सरी में पौधों को मजबूत बनाने के बाद उन्हें खुले क्षेत्र में रोपा गया। इस धैर्यपूर्ण प्रक्रिया से पौधों की सफलता दर बहुत बढ़ गई। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, बाद के वर्षों में पौधों के जीवित रहने की दर लगभग 99 प्रतिशत तक पहुँच गई थी।

जंगल के साथ खेती का विकास

ए.डी. नेगी का उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं था। वे चाहते थे कि यह क्षेत्र स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका का आधार भी बने। उनके प्रयासों से जंगल के आसपास आलू, मटर, राजमा, शतावरी, सूरजमुखी, मशरूम और अन्य फसलों का उत्पादन संभव हुआ। सेब और खुबानी जैसे पारंपरिक फलों की खेती को भी बढ़ावा मिला।

इस तरह उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास को एक-दूसरे से जोड़ा। उनके मॉडल ने यह साबित किया कि जंगल लगाना केवल प्रकृति बचाने का काम नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम भी हो सकता है।

ग्रामीणों के लिए प्रेरणा

शुरुआत में कई लोगों को विश्वास नहीं था कि इतनी ऊँचाई और ठंड वाले क्षेत्र में घना जंगल विकसित किया जा सकता है। लेकिन वर्षों की मेहनत के बाद जब थांग करमा की भूमि हरी होने लगी, तो आसपास के ग्रामीण भी प्रेरित हुए। रिपोर्टों के अनुसार, नेगी ने क्षेत्र के 200 से अधिक किसानों को अपनी भूमि को उपयोगी और हरा-भरा बनाने के लिए प्रेरित किया।

उनका काम केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं था। वे लोगों को बताते थे कि पौधा लगाना पहला कदम है, असली जिम्मेदारी उसकी देखभाल करना है। वे स्थानीय लोगों को पानी बचाने, मिट्टी का कटाव रोकने और जलवायु के अनुसार सही प्रजातियों का चुनाव करने की सलाह देते थे।

पर्यावरण संरक्षण का अमूल्य संदेश

ए.डी. नेगी की कहानी आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, जलस्रोतों के सूखने और जंगलों की कमी जैसी समस्याएँ हिमालयी क्षेत्रों को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में उनका जीवन हमें बताता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या बड़ी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। एक व्यक्ति भी लगातार प्रयास करके बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

उनका बनाया जंगल मिट्टी को बाँधने, पानी रोकने, तापमान संतुलित करने और जैव-विविधता बढ़ाने में सहायक बना। यह क्षेत्र आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला और प्रेरणा का केंद्र बन गया। ए.डी. नेगी ने सिद्ध किया कि प्रकृति के साथ काम करने वाला इंसान कठिन से कठिन भूभाग को भी जीवन से भर सकता है।

विरासत जो हमेशा जीवित रहेगी

ए.डी. नेगी का निधन वर्ष 2021 में हुआ, लेकिन उनका कार्य आज भी जीवित है। उन्होंने अपने जीवन के लगभग दो दशक एक ऐसे जंगल को विकसित करने में लगाए, जिसे बहुत से लोग असंभव मानते थे। उनके प्रयासों से थांग करमा में लगभग 65 हेक्टेयर क्षेत्र में हरियाली विकसित हुई और यह स्थान किन्नौर के पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण बन गया।

उनकी विरासत हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाती है—पहली, बड़े बदलाव की शुरुआत छोटे कदम से होती है; दूसरी, स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल प्रकृति संरक्षण को अधिक प्रभावी बना सकता है; और तीसरी, पर्यावरण के लिए काम करने में धैर्य सबसे आवश्यक गुण है।

ए.डी. नेगी ने केवल हजारों पौधे नहीं लगाए, उन्होंने उम्मीद बोई। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दिया कि बंजर धरती भी हरी हो सकती है, यदि इरादा मजबूत हो। किन्नौर के शीत मरुस्थल में खड़ा उनका जंगल आज भी पुकारता है—“एक व्यक्ति, एक संकल्प और हजारों पौधे मिलकर पूरी दुनिया बदल सकते हैं।”

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