दाल

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दाल

दाल अरहर, मूँग, उड़द, चना, मसूर, खेसारी आदि अनाजों को दलने से प्राप्त होती है। यह अनाज दलहन कहलाते हैं। ये सभी अनाज वनस्पति शास्त्र के लिग्यूमिनोसी (Leguminosae) गण के अंतर्गत हैं। दालें प्रोटीन की आवश्यकता की पूर्ति करने का प्रमुख स्रोत हैं। इन अनाजों के अतिरिक्त कुछ और बीज हैं, जैसे. सोयाबीन, सेम इत्यादि, जिनसे कहीं-कहीं दालें बनती हैं।

पोषक तत्त्व

हमारे भोजन का मुख्य अंग कार्बोहाइड्रेट है, जो हमें चावल, गेहूँ इत्यादि अन्नों से स्टार्च के रूप में तथा फलों से शर्करा के रूप में प्राप्त होता है। कार्बोहाइड्रेट का पाचन सरलता से होता है और इससे ऊर्जा प्राप्त होती है, किंतु मांसपेशी बनने, शरीर की वृद्धि तथा पुराने ऊतकों का नवजीवन प्रदान करने में कार्बोहाइड्रेट से कोई सहायता नहीं मिलती है। इन कार्यों के लिए प्रोटीन की आवयकता पड़ती है। मांसाहारी जीवों को मांस से तथा शाकाहारियों को वनस्पतियों से प्रोटीन प्राप्त होता है। दालें शाकाहारियों के प्रोटीन प्राप्त करने की प्रमुख स्रोत हैं। एक वयस्क व्यक्ति के संतुलित भोजन में डेढ़ छटाँक दाल का होना आवश्यक है।

प्रकार

भोजन में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख दालें निम्नलिखित हैं .

अरहर

यह पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में सर्वाधिक खाई जानेवाली दाल है। अन्य राज्यों में भी यह दाल है। अन्य राज्यों में भी यह दाल जनप्रिय है। अरहर में प्रोटीन 27.67 प्रतिशत, वसा 2.31 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 57.27 प्रतिशत, लवण 5.50 प्रतिशत तथा जल 10.08 प्रतिशत रहता है। इसमें विटामिन बी पाया जाता है।

मूँग

इसमें प्रोटीन 23.62 प्रतिशत, वसा 2.69 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 53.45 प्रतिशत, लवण 6.57 प्रतिशत तथा जल 10.87 प्रतिशत रहता है। इसमें विटामिन बी मिलता है। अन्य दालों की अपेक्षा यह शीघ्र पचती है। अतः रोगियों को पथ्य के रूप में भी दी जाती है।

उड़द

इसी को माष भी कहते हैं। इसमें प्रोटीन 25.5 प्रतिशत, वसा 1.7 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 53.4 प्रतिशत, लवण 3.3 प्रतिशत एवं जल 13.1 प्रतिशत होता है। इस दाल का पंजाब, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मद्रास एवं मध्य प्रदेश में अत्यधिक प्रचलन है। दाल के अतिरिक्त बड़ा, कचौड़ी, इमिरती, इडली और दोसे इत्यादि के बनान में उड़द की दाल का ही विशेष उपयोग होता है।

मसूर

इटली, ग्रीस और एशिया का देशज है। भारत में उत्तरप्रदेश, मद्रास, बंगाल एवं महाराष्ट्र में इसका व्यवहार अत्यधिक हाता है और इसे पौष्टिक आहार समझा जाता है। इसमें 25.5 प्रतिशत प्रोटीन, 1.9 प्रतिशत तेल, 52.2 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 3.4 प्रतिशत रफेज एवं 2.8 प्रतिशत लोहा होता है। इसकी राख में पोटाश एवं फॉस्फेट अधिक मात्रा में रहता है।

मटर

पूर्वी यूरोप का देशज है। इसकी दूसरी जाति पीसम सैटिवम है, जो एशिया का देशज है। इसमें 22.5 प्रतिशत प्रोटीन, 1.6 प्रतिशत तेल, 53.7 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 5.4 प्रतिशत रफेज तथा 2.9 प्रतिशत राख रहती है। लगभग सभ राज्यों में इसका उपयोग होता है। हरी फली से निकली मटर सब्जी के का आती है और पक जाने पर दाल के लिय इसका उपयोग होता है।

चना

इसका प्रयोग भारत में लगभग सभी प्रदेशों में सामान्य रूप से होता है। यह सभी दलहनों में सर्वाधिक पौष्टिक पदार्थ है। पालतू घोड़े को भी यह खिलाया जाता है। घोड़े को खिलाया जानेवाला चना अंग्रेजी में हॉर्स ग्राम कहलाता है। इसका वानस्पतिक नाम डॉलिकोस बाइफ्लोरस है। इसमें विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में रहता है। चने का बेसन पकौड़ी, बेसनी, कढ़ी तथा मिठाई बनाने के काम में आता है। हरा चना सब्जी बनाने एवं तलकर खाने के काम में आता है।

खेसारी

यह अत्यंत निम्नकोटि का दलहन है। पशुओं के खिलाने और खेतों में हरी खाद के लिए इसका उपयोग अधिक होता है। यह अल्प मात्रा में ही दाल के रूप में खाई जाती है। इसके अधिक सेबन से कुछ रोग हो जाने की सूचना मिली है।

सोयाबीन

यह पूर्वी एशिया का देशज है। इसकी फलियाँ छोटी, रोएँदार होती हैं, जिनमें दो से चार तक बीज होते हैं। इसमें 66.71 प्रतिशत जल, 5.5 प्रतिशत राख, 14 से 19 प्रतिशत वसा, 4.5 से 5.5 प्रतिशत रफेज, 5 से 6 प्रतिशत नाइट्रोजन, 1.5 से 3 प्रतिशत स्टार्च, 8 से 9,5 प्रतिशत हेमिसेलूलोज़, 4 से 5 प्रतिशत पेंटोसन रहता है। इनके अतिरिक्त कैल्सियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस रहते हैं।

सेम

यह कई प्रकार की होती है, जिसमें लाल और सफेद अधिक प्रचलित है। इसमें प्रोटीन 15 से 20 प्रतिशत, राख 6 से 7 प्रतिशत, शर्करा 21 से 29 प्रतिशत, स्टार्च और डेक्सट्रिन 14 से 23 प्रतिशत हेमिसेलूलाज 8.5 से 11 प्रतिशत तथा पेंटोसन लगभग 7 प्रतिशत रहता है। इसके प्रोटीन बिना पकाए शीघ्र नहीं पचते।

शस्यचक्र पद्धति

सभी दलहनों के लिए दोमट मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है। सभी दलहन वार्षिक पौधे हैं। इनके लिए समशीतोष्ण जलवायु और हलकी वर्षा आवश्यक होती है। दलहन के पौधों की जड़ों में वायुमंडल से नाइट्रोजन ग्रहण करने वाले जीवाणु रहते हैं, जो भूमि में नाइट्रोजन का संग्रह करके भूमि की उर्वरा शक्ति की वृद्धि करते हैं। इसलिए खेतों की उर्वरा शक्ति की वृद्धि करने के लिए शस्यचक्र की पद्धति अपनाई जाती है, जैसे. जिन खेतों में धान की फसल उगाई गई थी उनमें चने की फसल उगाई जाती है।

दलहन कृषि

भारत में रबी एवं खरीब दोनों फसलों के अन्तर्गत दालों की कृषि की जाती है। रबी की फसल के समय बोई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलें हैं . अरहर, चना, मटर, मसूर, आदि जबकि मूंग, उड़द, लोबिया आदि की कृषि खरीफ के समय की जाती है। दलहनी फसलों की दृष्टि से हमारे देश की प्रमुख विशेषता यह है कि इनकी कृषि अनुपजाऊ मिट्टी एवं वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों में ही की जाती रही है। चने की कृषि गंगा तथा सतलुज नदियों की ऊपरी घाटी एवं उसके समीपवर्ती मध्य प्रदेश राज्य तक ही सीमित है। इसका सबसे सघन क्षेत्र उत्तर प्रदेश में आगरा तथा मिर्जापुर ज़िलों के बीच पाया जाता है जबकि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात आदि प्रमुख उत्पादक राज्य है। 2007-08 में कुल 148 लाख टन का उत्पादन हुआ, जो 1990-91 की तुलना में 0.76 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है।

दलहन से दाल बनाना

दलहन से दाल छिलकेदार तथा बिना छिलके की बनाई जाती है। अब तो दलहन को दाल मिलों में भेजकर दाल बनवाना व्यावसायिक दृष्टि से लाभप्रद हो गया है। घरों में भी दलहन से दाल बनाई जाती है। छिलकेदार दाल बनाने के लिए जिस दलहन की दाल बनानी हो उसे चक्की द्वारा दल लेते हैं। बिना छिलके की दाल दो प्रकार से बनती है, पानी में भिगोकर अथवा मोयकर। दलहन को दलकर पानी में दो तीन घंटे तक भिगो देते हैं। इसके बाद दाल को पानी से निकालकर हाथ से खूब मसलकर छिलका अलग करते हैं और इस मसली हुई दाल को पानी में डाल देते हैं, जिससे छिलका पानी के ऊपर आ जाता है और दाल नीचे बैठ जाती है। छिलके को पानी के ऊपर से हटाकर, दाल को दो तीन बार मसलने और धोने से दाल प्रायः बिल्कुल छिलके रहित हो जाती है इस छिलके रहित दाल को धूप में सुखाकर रख लिया जाता है।

छिलके रहित दाल बनाने की दूसरी विधि है, पहले दलहन को धूप में खूब सुखा लेते हैं। एक सेर दलहन के लिए पानी में एक भर तेल मिलाकर, रात में दलहन को मोयकर, रातभर ढककर रख देते हैं और सुबह धूप में सुखाते हैं। इस सूखे दलहन को चक्की में दलकर ओखली में छाँट लेते हैं, जिससे छिलका अलग हो जाता है। दाल को छाँटने में विशेष योग्यता की आवश्यकता होती है, जिससे दाल टूटे नहीं।