गुच्छी

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गुच्छी

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30,000 रुपये प्रति किलो पर बिकने वाली इस सब्जी का नाम गुच्छी है। गुच्छी का वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है, लेकिन इसे हिंदी में स्पंज मशरूम कहा जाता है। यह सब्जी हिमाचल, कश्मीर और हिमालय के ऊंचे पर्वतीय इलाकों में ही होती है। यह गुच्छी बर्फ पिछलने के कुछ दिन बाद ही उगती है।

इस सब्जी का उत्पादन पहाड़ों पर बिजली की गड़गड़ाहट और चमक से निकलने वाली बर्फ से होता है। प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगने वाली गुच्छी शिमला जिले के लगभग सभी जंगलों में फरवरी से लेकर अप्रैल माह के बीच तक ही मिलती है।

गाँवगाँव से आते हैं लोग

फरवरी माह से पहले ही हिमाचल के कई गाँवों के ग्रामीण इन जंगलों में आ जाते हैं। झाड़ियों और घनी घास में पैदा होने वाली इस गुच्छी को ढ़ूढने के लिए पैनी नजर के साथ ही कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। ऐसे में अधिक मात्रा में गुच्छी हासिल करने के लिए ग्रामीण सबसे पहले इन जंगलों में आते हैं और सुबह से ही गुच्छी को ढ़ूढने के अभियान में जुट जाते हैं। आलम यह है कि गुच्छी से मिलने वाले अधिक मुनाफे के लिए कई ग्रामीण इस सीजन का बेसब्री से इंतजार करते हैं और सीजन के दौरान बेरोजगार लोग भी अधिक से अधिक गुच्छियां ढ़ूढकर अच्छी खासा मुनाफा कमा लेते हैं।

हाथोंहाथ बिक जाती हैं गुच्छियां

इस दुलर्भ सब्जी को बड़ी-बड़ी कंपनियां और होटल हाथों-हाथ खरीद लेते हैं। इन लोगों से गुच्छी बड़ी कंपनियां 10 से 15 हजार रुपये प्रति किलो में खरीद लेते हैं, जबकि बाजार में इस गुच्छी की कीमत 25 से 30 हजार रुपये प्रति किलो तक है। यह सब्जी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप, फ्रांस, इटली और स्विजरलैंड जैसे देशों में भी गुच्छी की भारी डिमांड है।

इसे खाने से नहीं होती है दिल की बीमारी

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ऐसा माना जाता है कि यह सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर है और इसको नियमित सेवन से दिल की बीमारियां नहीं होती हैं। यहां तक कि जो हार्ट पेशेंट हैं, उन्हें भी इसके उपयोग से लाभ मिलता है। गुच्छी में विटामिन बी और डी के अलावा सी और के प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इस गुच्छी को बनाने की विधि में डायफ्रूट, सब्जियां और घी इस्तेमाल किया जाता है। गुच्छी की सब्जी बेहद लजीज पकवानों में गिनी जाती है।